हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (HSSC) द्वारा जूनियर इंजीनियर (सिविल) पदों के लिए वर्ष 2019 में भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी।
- Notification जारी: 15 जून 2019
- Written Exam: 1 सितंबर 2019
- Result announced: 21 सितंबर 2019
- Documents verification: अक्टूबर 2019
- Last selection list: 6 जून 2020
हालांकि, इस process में एक गंभीर चूक सामने आई—HSSC ने candidates का biometric verification नहीं किया, जो कि पहले से ही high court के आदेशों के तहत अनिवार्य था।
हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: न्यायिक आदेश की अवहेलना
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज की एकल पीठ ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Biometric verification कोई प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि एक न्यायिक आदेश है जिसे टाला नहीं जा सकता।
“HSSC ने जानबूझकर आदेश को भ्रामक तरीके से पेश किया, जिससे ऐसा प्रतीत हो कि आदेश का पालन हुआ है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।” — न्यायालय की टिप्पणी
याचिका की मुख्य मांगें
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से निम्नलिखित निर्देश मांगे:
- OMR शीट पर दर्ज बायोमेट्रिक सिग्नेचर की तुलना आधार डाटा से की जाए
- यह सुनिश्चित किया जाए कि जिसने आवेदन किया, वही परीक्षा में उपस्थित हुआ
- दस्तावेज़ों, प्रमाणपत्रों और शपथपत्रों की गहन जांच की जाए
- संशोधित मेरिट सूची जारी की जाए, केवल सत्यापन के बाद
Biometric verification क्यों है ज़रूरी?
Biometric verification का उद्देश्य परीक्षा में impersonation (छद्म अभ्यर्थी) को रोकना है। 2017 और 2018 में हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सभी recruitment process में आधार आधारित biometric मिलान अनिवार्य होगा।
यह कदम इसलिए उठाया गया था क्योंकि कई परीक्षाओं में फर्जी अभ्यर्थियों के शामिल होने की शिकायतें सामने आई थीं।
HSSC की सफाई और कोर्ट की प्रतिक्रिया
HSSC ने अपने जवाब में दावा किया कि document verification किया गया था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि JE भर्ती में यह प्रक्रिया पूरी तरह से नजरअंदाज की गई थी।
“यह एक शरारतपूर्ण कोशिश थी, जिससे न्यायालय को भ्रमित किया जा सके।” — हाईकोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा कि HSSC को यह अधिकार नहीं था कि वह अपनी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर transfer कर दे।
परिणाम: अवमानना नोटिस और परिणाम वापसी
High court ने HSSC को अवमानना का notice जारी किया और आदेश दिया कि:
- JE भर्ती का अंतिम परिणाम वापस लिया जाए
- आधार आधारित biometric verification किया जाए
- तीन माह के भीतर संशोधित मेरिट सूची जारी की जाए
- जब तक सत्यापन नहीं होता, कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी
UPSC और सरकारी परीक्षा अभ्यर्थियों के लिए सीख
इस मामले से कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:
- परीक्षा पारदर्शिता और निष्पक्षता सर्वोपरि है
- न्यायिक आदेशों की अवहेलना गंभीर परिणाम ला सकती है
- अभ्यर्थियों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए
- संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है
निष्कर्ष: एक systemic सुधार की आवश्यकता
यह मामला केवल एक recruitment process की गलती नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे संस्थागत लापरवाही न्याय व्यवस्था को चुनौती देती है। HSSC जैसे आयोगों को न केवल तकनीकी रूप से सक्षम होना चाहिए, बल्कि न्यायिक आदेशों के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह भी होना चाहिए।
इस निर्णय से उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में सभी भर्ती प्रक्रियाएं अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और technical रूप से सुरक्षित होंगी।